मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : नाना के लाड़ प्यार का ऐसा सिला दिया
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : ताहिर रज़ा रामपुरी
नातख्वान/कलाकार: ताहिर रज़ा रामपुरी
जोड़ा गया : 26 Sep, 2022 03:00 PM IST
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नाना के लाड़ प्यार का ऐसा सिला दिया
गर्दन कटा के दीन का रुतबा बढ़ा दिया।
देकर लहू का एक-एक क़तरा हुसैन ने
कर्बो बला के ज़र्रों को तारा बना दिया।
नाना के लाड़ प्यार का ऐसा सिला दिया
गर्दन कटा के दीन का रुतबा बढ़ा दिया।
क्यों आक़िबत का तुझको न आया ज़रा ख्याल
क्या सोंच के हुसैन पे खंजर चला दिया।
नाना के लाड़ प्यार का ऐसा सिला दिया
गर्दन कटा के दीन का रुतबा बढ़ा दिया।
प्यारे नबी के दीन पर ज़ैनब ने क़ीमती
अपना अजी़ज़े जान वो हीरा लुटा दिया।
नाना के लाड़ प्यार का ऐसा सिला दिया
गर्दन कटा के दीन का रुतबा बढ़ा दिया।
ताहिर सलाम करता है अपने हुसैन को
दीने नबी के वासते सब कुछ लुटा दिया।
नाना के लाड़ प्यार का ऐसा सिला दिया
गर्दन कटा के दीन का रुतबा बढ़ा दिया।
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यह भावपूर्ण मन्क़बत हज़रत इमाम हुसैन (र.अ.) द्वारा अपने नाना, हज़रत मोहम्मद ﷺ के धर्म (इस्लाम) की रक्षा के लिए दी गई ऐतिहासिक और महान क़ुरबानी का एक अत्यंत श्रद्धापूर्ण वर्णन है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि इमाम हुसैन (र.अ.) ने अपने नाना के लाड़-प्यार का ऋण इस तरह चुकाया कि सत्य के मार्ग पर चलते हुए अपनी गर्दन कटा दी और इस्लाम के सम्मान को सर्वोच्च स्थान पर पहुँचा दिया। उन्होंने कर्बला की तप्त रेत पर अपने पवित्र रक्त की बूंदें बहाकर वहाँ के साधारण कणों (ज़र्रों) को भी सितारों की तरह हमेशा के लिए रौशन और अमर कर दिया।
| शब्द | अर्थ (Hindi) |
|---|---|
| सिला | बदला / प्रतिफल या इनाम |
| दीन | धर्म / सत्य का मार्ग |
| रुतबा | मान-सम्मान / ऊँचा पद या मर्तबा |
| ज़र्रों | मिट्टी के छोटे कणों / धूल के कण |
| आक़िबत | परलोक / आख़िरत (मृत्यु के बाद का जीवन) |
| अज़ीज़-ए-जान | प्राणों से प्रिय / बहुत लाडला |
कवि कहता है कि इमाम हुसैन (र.अ.) ने इस्लाम की ख़ातिर अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। वह उस क्रूर हत्यारे (शिम्र/यज़ीदी सेना) की सोच पर सवाल उठाता है जिसे नवासा-ए-रसूल पर ख़ंजर चलाते समय परलोक (आक़िबत) के न्याय का ज़रा भी भय नहीं लगा। इस धर्म-युद्ध में उनकी बहन हज़रत ज़ैनब (र.अ.) ने भी अपने प्राणों से प्यारे बेटों (हीरों) को धर्म पर कुर्बान कर दिया, जिसके लिए कवि 'ताहिर' इमाम हुसैन (र.अ.) के इस महान त्याग को शत-शत प्रणाम करता है।
शायर के अनुसार, ज़ालिम ने नवासा-ए-रसूल हज़रत इमाम हुसैन (र.अ.) पर ख़ंजर चलाते वक्त किस चीज़ का ज़रा भी ख़्याल नहीं किया था?