मेरे सरकार आए
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टाइटल : मोरे ख़्वाजा महाराजा करो कृपा
श्रेणी (कटेगरी) : कव्वाली के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : उबैद अशरफी
नातख्वान/कलाकार: उबैद अशरफी
जोड़ा गया : 19 Feb, 2023 11:07 AM IST
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ख़्वाजा जी, ख़्वाजा जी, या ख़्वाजा जी, या ख़्वाजा जी
दिलों पे हज़रत-ए-ख़्वाजा पिया की हुक्मरानी है,
अजब तर्ज़-ए-तकल्लुम है, अजब मौज-ए-रवानी है
ख़ुदा ने इसलिए ख़्वाजा पिया की बात मानी है,
मेरा ख़्वाजा, मेरे प्यारे मोहम्मद (ﷺ) की निशानी है
ख़्वाजा हमारे दर्द का दरमाँ तुम्हीं तो हो,
हम जिसमें बस रहे हैं वो दुनिया तुम्हीं तो हो
माला तुम्हारे नाम की क्यों कर ना हम जपें,
हम चिश्तियों का हासिल-ए-ईमान तुम्हीं तो हो
साहब जी, सुलतान जी, तुम बड़े ग़रीब नवाज़
साहब जी, सुलतान जी, तुम बड़े ग़रीब नवाज़
मोरे ख़्वाजा महाराजा करो कृपा,
मोरे ख़्वाजा महाराजा करो कृपा
मोपे कृपा करो, मोपे कृपा करो, मोपे कृपा करो,
मोरे ख़्वाजा महाराजा करो कृपा,
ख़्वाजा उस्मान के लाल करो कृपा
आपका मेला जब जब आया, सब ने आस लगाई,
सब लाए फूलों की चादर, मैं टूटा दिल लाई
मोरे ख़्वाजा महाराजा करो कृपा,
ख़्वाजा उस्मान के लाल करो कृपा
कृपा कीजिए, दर्शन दीजिए, सोए भाग जगाइयो,
मौला अली के सदके में, कभी मोरे घर भी आइयो
मोरे ख़्वाजा महाराजा करो कृपा,
ख़्वाजा उस्मान के लाल करो कृपा
तुमरा दुआर छोड़ कित जाऊं,
तुम हो ग़रीब नवाज़ बलमवा
चाहे बनाओ, चाहे बिगाड़ो,
लाज है तुमरे हाथ बलमवा
सब भूले, मुझे तुम नहीं भूलियो,
तुमसे लगी मोरी आस बलमवा
अब तुम मेरे बनो ना बनो, तुमको इख़्तियार,
तक़दीर ने मुझे तो तुम्हारा बना दिया
मोरे ख़्वाजा महाराजा करो कृपा,
ख़्वाजा उस्मान के लाल करो कृपा
ना हम तक़दीर लाए हैं, ना हम तदबीर लाए हैं,
गले में तौक है और पांव में ज़ंजीर लाए हैं,
हम अपने दिल में पीर की तस्वीर लाए हैं
मोरे ख़्वाजा महाराजा करो कृपा,
ख़्वाजा उस्मान के लाल करो कृपा
जुग-जुग जियो, चंदा मांदे तू जा मानिया,
सानु याद रखे, तोड़ी बड़ी मेहरबानियां
तेरे तो बग़ैर मेरा दिल नयों लगना,
तूं सानु लब्बन के ऐसा नयों लब्बना
फिक्र ना कर, मैं तो छत मोरे आऊंगा,
ख़्वाजा याद रखो, तोरा प्यार न भूलाऊंगा
मोरे ख़्वाजा महाराजा करो कृपा,
ख़्वाजा उस्मान के लाल करो कृपा
ऐसी रंग दो, रंग नहीं छूटे,
ऐसी रंग दो, रंग दो
रंग वो रंग जिसमें ख़ुशबू फूटे
ज़ुल्फ़-ए-मोहम्मद (ﷺ) की ख़ुशबू बसा दे,
बू-ए-अली से चुनरिया महका दे
ख़ुशबू हो कहरुल निशा के चमन की,
शब्बीर ओ शब्बार के मुश्को दहन की
ख़्वाजा क़ुत्ब को भी ये रंग भाए,
बाबा फरीद ख़ुश हो हो जाएं
अपने करम की कर दो नज़रियॉं,
ख़्वाजा पिया मोरी रंग दो चुनरिया
मोरे ख़्वाजा महाराजा करो कृपा,
ख़्वाजा उस्मान के लाल करो कृपा
तुमको रसूल-ए-पाक की अज़मत का वास्ता,
ख़्वाजा करम करो, तुम्हें निस्बत का वास्ता
मोरे ख़्वाजा महाराजा करो कृपा,
ख़्वाजा उस्मान के लाल करो कृपा
मोहम्मद (ﷺ) पर जो उतरा है उसी क़ुरआन का सदका,
अपने पीर-ओ-मुर्शिद ख़्वाजा उस्मान का सदका
मोरे ख़्वाजा महाराजा करो कृपा,
ख़्वाजा उस्मान के लाल करो कृपा
दुनिया समझ रही है मेरा कोई भी नहीं,
मैं मुतमइन हूँ मेरे तरफ़ चश्म-ए-यार है,
ना देखो ख़ामियाँ मेरी, दिखाओ शान-ए-रहमत की,
तुम्हारे हूँ, तुम्हें रखनी पड़ेगी लाज निस्बत की
मोरे ख़्वाजा महाराजा करो कृपा,
ख़्वाजा उस्मान के लाल करो कृपा
ये दोपहर का आलम और धूप चिलचिलाती,
जाती है एक दुखिया, ख़्वाजा से लौ लगाती,
जा तो रही है, लेकिन मंज़िल से बेख़बर है,
ये उसके इश्क़-ए-कामिल का देखिए असर है,
ख़ुद उसका इश्क़, उसको मंज़िल पे ले चला है,
दरियाए-मआरिफ़त के साहिल पे ले चला है,
जलती हुई ज़मीन है और नंगे पांव चलना,
ख़्वाजा का नाम लेना, फिर गिर के फिर संभलना,
उस दर पे पहुँची जिस दम, बे-कस वो ग़म की मारी,
देखा जो दर-ए-ख़्वाजा, रो रो के ये पुकारि:
"मैं अपने वक़्त-ए-ख़ुफ़्ता को तेरे दर से जगाऊंगी,
अभागन बनके आई थी, सुहागन बनके जाऊंगी!"
मोरे ख़्वाजा महाराजा करो कृपा,
ख़्वाजा उस्मान के लाल करो कृपा
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यह सूफ़ियाना रंग, ब्रजभाषा और उर्दू के सुंदर मेल से बनी एक बेहद विख्यात और भावुक मनक़बत है। इसमें अजमेर शरीफ़ के महान सूफ़ी संत हज़रत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती (ग़रीब नवाज़) की बारगाह में एक अक़ीदतमंद (भक्त) की अटूट श्रद्धा और आत्मसमर्पण को दर्शाया गया है।
इन रूहानी पंक्तियों का अर्थ है कि "सुलतान-ए-हिन्द ख़्वाजा ग़रीब नवाज़ करोड़ों दिलों के राजा हैं, क्योंकि वह पैग़ंबर मोहम्मद ﷺ की सच्ची निशानी और रहमत का रूप हैं।" जब उर्स (मेले) के मौक़े पर पूरी दुनिया उनके दरबार में मन्नत के फूलों की चादर लेकर आती है, तब एक लाचार और दुखी मुरीद अपना टूटा हुआ दिल लेकर हाज़िर होता है और अपनी क़िस्मत को मौला अली और नबी के रूहानी रंग में रंगने की भीख मांगता है।
| शब्द | हिंदी अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| हुक्मरानी / तर्ज़-ए-तकल्लुम | शासन (राज) / बात करने का अनोखा और सुंदर तरीक़ा |
| दरमाँ / हासिल-ए-ईमान | मर्ज़ का इलाज या दवा / विश्वास (ईमान) की असल पूंजी |
| ग़रीब नवाज़ / मोपे | ग़रीबों को पालने और उन पर कृपा करने वाला / मुझ पर |
| इख़्तियार / तदबीर | अधिकार या हक़ / उपाय, युक्ति या कोशिश |
| तौक / निस्बत | गले का पट्टा या दासता का प्रतीक / रूहानी संबंध या जुड़ाव |
| मुतमइन / चश्म-ए-यार | संतुष्ट (तसल्ली में होना) / महबूब (गुरु) की कृपादृष्टि |
| दरियाए-मआरिफ़त / साहिल | दिव्य ज्ञान (अध्यात्म) का समंदर / किनारा |
| वक़्त-ए-ख़ुफ़्ता | सोया हुआ भाग्य (सोया हुआ वक़्त) |
इस सुंदर सूफ़ी कलाम का मूल सार यह है कि चिश्ती सिलसिले के गुरु अपने मुरीद के लिए हर दर्द की दवा और आख़िरी आसरा होते हैं। एक अभागन दुखिया चिलचिलाती धूप में, नंगे पैर जलती ज़मीन पर गिरती-संभलती सिर्फ़ ख़्वाजा का नाम लेकर उनके दर पर पहुँचती है; क्योंकि उसे अपनी कमियों के बावजूद ख़्वाजा की 'शान-ए-रहमत' (कृपा) और रूहानी रिश्ते पर पूरा भरोसा है। अंत में मुरीद का विश्वास जीत जाता है, और वह रोते हुए कहती है कि भले ही वह इस दर पर अभागन (बदकिस्मत) बनकर आई थी, लेकिन ख़्वाजा की दया और दीदार पाकर वह यहाँ से सुहागन (ख़ुशनसीब) बनकर लौटेगी।
लिरिक्स के मुताबिक, जब सब लोग ख़्वाजा के दरबार पर फूलों की चादर लाते हैं, तो शायर उनके दर पर क्या लेकर जाता है?