मेरे सरकार आए
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टाइटल : मुहम्मद ﷺ न होते तो कुछ भी न होता
श्रेणी (कटेगरी) : कव्वाली के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : अनवर गुजराती
नातख्वान/कलाकार: चांद अफज़ल कादरी
जोड़ा गया : 05 Dec, 2022 07:46 AM IST
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इस्लाम का उसूल कोई मानता नहीं,
रोज़ा, नमाज़, हज, ज़कात जानता नहीं।
रूए ज़मीं पे आते न जो आमिना के लाल,
कोई ख़ुदा-ए-पाक को पहचानता नहीं।
न कलियाँ ही खिलतीं, न फूल मुस्कुराते,
अगर बाग़-ए-हस्ती का माली न होता।
ये सब है मेरे कमली वाले का सदक़ा,
मुहम्मद ﷺ न होते तो कुछ भी न होता।
ज़मीन, आसमान, चाँद, तारे न होते,
ये दुनिया के रंगीन नज़ारे न होते।
न गुंचे चटकते, न फूल मुस्कुराते,
न पंछी ही वहदत के नग़मे सुनाते।
न गुलशन में आती ये रंगीन बहारें,
बरसती न रहमत की रिमझिम फुहारें।
गुलों में ये रंग-ए-जमाली न होता,
मुहम्मद ﷺ न होते तो कुछ भी न होता।
ये सब है मेरे कमली वाले का सदक़ा,
मुहम्मद ﷺ न होते तो कुछ भी न होता।
तुफ़ैल-ए-मुहम्मद ﷺ ये दुनिया बनी है,
इन्हीं के क़दमों से ये धरती सजी है।
पहाड़ों, समंदर, ये गुलशन, ये सहरा,
ये दिन-रात, ये सुबह-ओ-शाम-ओ-सवेरा।
न आग़ाज़ होता, न अंजाम होता,
न क़ुरआन का जारी फ़रमान होता।
निशान तक भी दुनिया का बाक़ी न होता,
मुहम्मद ﷺ न होते तो कुछ भी न होता।
कहाँ फिर ये ख़िल्क़त की तक़्लीक़ होती,
कहाँ फिर सदाक़त की तस्दीक़ होती।
ये आदम का पुतला बनाया न होता,
नबी कोई दुनिया में आया न होता।
न याक़ूब, यूसुफ़, न ईसा, न मूसा,
न दाऊद, याह्या, न नूह, न ज़करिया।
नबूवत का ये सिलसिला न होता,
मुहम्मद ﷺ न होते तो कुछ भी न होता।
न “अल्लाहु अकबर” की आती सदाएँ,
कभी ख़त्म होता न दौर-ए-जाहिलियत।
बदलती न हरगिज़ ज़माने की हालत।
न काबा में होती अज़ान-ए-बिलाली,
बुतों से कभी काबा होता न ख़ाली।
अगर नूर-ए-हक़ का वो साथी न होता,
ख़ुदा का कोई भी पुजारी न होता।
न “अल्लाहु अकबर” की आती सदाएँ,
न बंदों की मक़बूल होती दुआएँ।
न आयतें आतीं, न क़ुरआन आता,
न उम्मत की बख़्शिश का सामान आता।
न घर-घर में क़ुरआन की होती तिलावत,
न अल्लाह की कोई करता इबादत।
कहीं पर भी ज़िक्र-ए-इलाही न होत
मुहम्मद ﷺ न होते तो कुछ भी न होता।
ख़ुदा जाने क्या होता महशर में अनवर,
न आते जहाँ में जो मौला के दिलबर।
गुनहगार देते तब किसकी दुहाई,
न मिलती कभी आशियों को रिहाई।
ख़ताओं पे असी बहुत गिड़गिड़ाते,
अज़ाब-ए-इलाही से पर बच न पाते।
ख़ुदा बख़्श देने पे राज़ी न होता,
मुहम्मद ﷺ न होते तो कुछ भी न होता।
नबी की जो जलवा-नुमाई न होती,
ख़ुदा की क़सम ये ख़ुदाई न होती।
ज़माने में हर सिम्त रहता अंधेरा,
सदा रहता तारीक़ियों का बसेरा।
ये सब है मेरे कमली वाले का सदक़ा।
अगर पैदा मौला के दिलबर न होते,
ये मिंबर-महराब मुनव्वर न होते।
ये सब है मेरे कमली वाले का सदक़ा,
मुहम्मद ﷺ न होते तो कुछ भी न होता।
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यह नात-ए-पाक नबी करीम ﷺ की अज़मत, मर्तबे और उनकी सुल्तानात का बयान है, जिसमें बताया गया है कि इस पूरी कायनात का निजाम और हर नेमत उन्हीं के सदके में है।
इस कलाम का मतलब है कि अगर दुनिया में हुज़ूर ﷺ तशरीफ़ न लाते, तो न तो कोई ख़ुदा को पहचानता और न ही इस सृष्टि का वजूद होता। ज़मीन, आसमान, चाँद-तारे, पिछले सारे नबी, और यहाँ तक कि नमाज़, अज़ान और क़ुरआन की तिलावत सब उन्हीं के नूर का सदक़ा हैं।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| बाग़-ए-हस्ती (Baage Hasti) | सृष्टि का बग़ीचा / अस्तित्व का संसार |
| वहदत (Vehdat) | ईश्वर की एकरूपता / एकेश्वरवाद (Tauheed) |
| तुफ़ैल-ए-मुहम्मद (Tufaile Mohammad) | मुहम्मद ﷺ के माध्यम से / उनके सदक़े में |
| सहरा (Sehra) | रेगिस्तान (Desert) |
| ख़िल्क़त की तक़्लीक़ (Hilqat Ki Takhleq) | मानव जाति की रचना / पैदाइश |
| सदाक़त की तस्दीक़ (Sadakat Ki Tasdek) | सत्य का प्रमाण / सच्चाई की पुष्टि |
| दौर-ए-जाहिलियत (Daure Jahalat) | अज्ञानता का काल / अंधकार का दौर |
| आशियों / असी (Aasiyon) | गुनहगारों / पापियों (Sinner) |
कायनात का हर एक ज़र्रा और हर नेमत हुज़ूर ﷺ की अता है। शायर 'अनवर' कहते हैं कि सृष्टि के निर्माण से लेकर क़यामत के दिन गुनहगारों की बख़्शिश (मुक्ति) तक, सब उन्हीं से जुड़ा है। अगर कमली वाले ﷺ न होते, तो ख़ुदा की इबादत करने वाला और उसकी रहमत पाने वाला कोई न होता।
शायर के मुताबिक अगर "आमिना के लाल" दुनिया में न आते तो लोग किस चीज़ को नहीं पहचानते, और कयामत (महशर) में गुनहगारों का क्या अंजाम होता?