मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : Ghar Ghar Ujala Ba Tohre Ghar Se
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : शमीम रज़ा फ़ैज़ी
नातख्वान/कलाकार: शमीम रज़ा फ़ैज़ी
जोड़ा गया : 14 May, 2022 09:37 AM IST
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Ghar Ghar Ujala Ba Tohre Ghar Se
Angna Maa Aaqa Tohre Noor Barse
Aaqa Qayamat Ki Garmi Padat Ba
Aaqa Qayamat Ki Garmi Padat Ba
Dhoop Se Sara Badan Ba Jalat Ba
Chaadar Hataiyo Na More Sar Se
Angna Maa Aaqa Tohre Noor Barse
Gaare Soar Me Jab Band Bhailan Surkhwa
Das Kar Ke Siddique Se Kahe Lagal Sapwa
Charan Hataawa Aaqa Naina Tarse
Angna Maa Aaqa Tohre Noor Barse
Jaiyke Madine Me Kahna Bayariya
Ab To Bula Lo Aaqa Taiba Nagariya
Ab Mori Ankhiyan Se Sawan Barse
Angna Maa Aaqa Tohre Noor Barse
Ghar Ghar Ujala Ba Tohre Ghar Se
Angna Maa Aaqa Tohre Noor Barse
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यह भोजपुरी और अवधी भाषा के लोक-रंग में रची गई एक अत्यंत मधुर, भावुक और सुंदर नात शरीफ़ है, जिसमें स्थानीय भाषा के माध्यम से पैगंबर मुहम्मद ﷺ के प्रति अटूट प्रेम, मदीना जाने की तड़प और ऐतिहासिक प्रसंगों को बहुत सादगी से प्रस्तुत किया गया है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि हे आक़ा, संसार के प्रत्येक घर में जो ज्ञान और मार्गदर्शन का उजाला है, वह आपके ही पवित्र दर से है, और आपकी कृपा से भक्तों के आँगनों में नूर बरस रहा है। प्रलय (क़यामत) के दिन जब असहनीय धूप और प्रचंड गर्मी से सारा बदन जल रहा होगा, तब मेरी आपसे यही विनती है कि मेरे सिर से अपनी दया और करुणा की छादर मत हटाना।
| शब्द | अर्थ (Hindi) |
|---|---|
| उजाला बा तोहरे घर से | आपके ही घर (दर) से प्रकाश है |
| ग़ार सौर | मक्का की वह गुफ़ा (ग़ार-ए-सौर) जहाँ हिजरत के समय नबी और हज़रत अबू बक्र ने पनाह ली थी |
| सुरख़वा / सपवा | सुरख़वा (पवित्र मुखमंडल/नबी) / साँप |
| चरन / नैना | यहाँ अर्थ पावन उपस्थिति या स्थान से है / आँखें |
| बयरईया | पुरवाई / ठंडी या मंद हवा |
| तयबा नगरिया | पवित्र मदीना शहर |
इस नात में कवि ने अवधी-भोजपुरी शैली में दो प्रमुख भाव व्यक्त किए हैं। पहला ऐतिहासिक प्रसंग ग़ार-ए-सौर का है, जहाँ हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (र.अ.) को गुफ़ा के छेद से डसने वाले साँप ने अपनी ज़बान में कहा था कि वह वर्षों से नबी के दर्शन (नैना तरसे) के लिए व्याकुल था, इसलिए वह पैर हटाने की प्रार्थना कर रहा था। दूसरा भाव विरह का है, जिसमें कवि ठंडी हवा (बयरईया) से मिन्नत करता है कि मदीना जाकर मेरा यह संदेश दे दो कि अब मेरी आँखें सावन के आँसुओं की तरह बरस रही हैं, इसलिए अब मुझे भी अपनी पावन नगरी (तयबा) बुला लीजिए।
नात के अनुसार, ग़ार-ए-सौर (Ghaar-e-Saur) में हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (र.अ.) को डसने के बाद साँप ने नबी के दीदार के लिए क्या गुज़ारिश की थी?