मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
- 1 दिन पहले fiber_manual_record 54 बार देखा गया
टाइटल : Dil Yeh Bechain Rehne Laga Aaj Kal
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: अशफाक कादरी अलीमी
जोड़ा गया : 24 Sep, 2022 02:07 PM IST
बार देखा गया : 3K बार डाउनलोड हुआ : 159
Time to read: 1 min read
translate बोल (लीरिक्स) की भाषा चुनें:
Dil Ye Bechain Rehne Laga Aaj Kal,
Ye Na Poocho Ki Is Dil Ko Kya Chahiye
Na Dawa Chahiye Na Shifa Chahiye,
Rauza E Mustafa Ki Hawa Chahiye
Hai Mera Peer Akhtar Raza Azhari,
Jinko Kahte Hain Tajushshariya Sabhi
Hain Sabhi Apne Jagah Mohtaram,
Par Mujhe Mera Akhtar Raza Chahiye
Apne Jannat Ke Nazdeek Jaya Karo,
Paun Maa Baap Ke Tum Dabaya Karo
Maa Baap Ko Na Sataya Karo,
Gar Tumhe Apne Rab Ki Raza Chahiye
Dil Ye Kehta Hai Aaenge Aaenge Woh,
Apni Surat Mujhe Bhi Dikhayenge Woh
Dekhna Ho Agar Rooe Khairul Wara,
Lab Pe Har Waqt Salley Ala Chahiye
Shayari Bhi Ae Kashif Nikhar Jayegi,
Akhirat Bhi Yaqinan Sawar Jayegi
Ishq Hassan Dil Mein Paida Karo,
Sath Mein Fikre Ahmad Raza Chahiye
This summary is AI-generated • Reviewed for quality.
यह भावपूर्ण नात और मन्क़बत मदीना शरीफ़ की तड़प, माता-पिता की सेवा का महत्व, और अपने गुरु (मुर्शिद) के प्रति सच्ची श्रद्धा का एक बहुत ही सुंदर और शिक्षाप्रद वर्णन है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि आाशिकाना दिल मदीना की याद में हर पल व्याकुल रहता है; उसे सांसारिक दुखों से मुक्ति के लिए कोई दवा या इलाज (शिफ़ा) नहीं, बल्कि सिर्फ़ हुज़ूर ﷺ के पवित्र रौज़े की ठंडी और रूहानी हवा चाहिए। कवि का मानना है कि यदि कोई ईश्वर (रब) की प्रसन्नता चाहता है, तो उसे अपनी जन्नत यानी अपने माता-पिता की सेवा करनी चाहिए और उन्हें कभी दुखाना नहीं चाहिए।
| शब्द | अर्थ (Hindi) |
|---|---|
| शिफ़ा | बीमारी से मुक्ति / स्वास्थ्य लाभ |
| मोहतरम | आदरणीय / सम्मानित |
| रज़ा | इच्छा / प्रसन्नता या मर्ज़ी |
| रुए खैरुल वारा | सबसे उत्तम सृष्टि (हुज़ूर ﷺ) का पवित्र मुखड़ा |
| सल्ले अला | हुज़ूर ﷺ पर पढ़ा जाने वाला दरूद शरीफ़ |
| आख़िरत | परलोक / मृत्यु के बाद का जीवन |
कवि कहता है कि यदि आपके दिल में पैगंबर ﷺ (ख़ैरुल वारा) के दीदार की सच्ची चाह है, तो आपकी ज़ुबान पर हर समय दरूद शरीफ़ का वास होना चाहिए। कलाम में ताजुश्शरिया हज़रत अख़्तर रज़ा ख़ान के प्रति असीम प्रेम व्यक्त किया गया है। अंत में कवि 'काशिफ़' स्वयं को और दूसरों को नसीहत देता है कि अपनी कला (शायरी) और परलोक (आख़िरत) दोनों को सँवारने के लिए दिल में हज़रत हस्सान बिन साबित जैसा प्रेम और आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान जैसी इस्लामी सोच व फ़िक्र पैदा करनी होगी।
शायर के अनुसार, यदि कोई इंसान अपने रब (ईश्वर) की रज़ा और ख़ुशी चाहता है, तो उसे किसके पाँव दबाने चाहिए और उन्हें नहीं सताना चाहिए?