मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : Dil Ka Arman Hai Aarzoo Hai Yehi
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : शमीम रज़ा फ़ैज़ी
नातख्वान/कलाकार: शमीम रज़ा फ़ैज़ी
जोड़ा गया : 10 Nov, 2022 01:50 PM IST
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Dil Ka Arman Hai Aarzoo Hai Yehi,
Mera Seena Madina Bana Dijiye
Dil Ka Arman Hai Aarzoo Hai Yehi,
Mera Soya Muqaddar Jaga Dijiye
Mar Na Jaoon Kahi Khatam-ul-mursalin,
Sabz Gumbad Kisi Din Dikha Dijiye
Pyar Se Bole Ek Din Yeh Zehra Ke Lal,
Suniye Ek Bat Meri Aye Pyare Belal
Jo Sunate Rahe Nana Jaan Ko Mere,
Woh Azan Aaj Phir Se Suna Dijiye
Dil Ka Arman Hai Aarzoo Hai Yehi,
Mera Soya Muqaddar Jaga Dijiye
Jo Bhi Murda Kahe Mere Sarkar Ko,
Chodiye Na Kisi Aise Gaddar Ko
Chad Ke Seene Pe Uske Mere Dosto,
Dono Hatho Se Gardan Daba Dijiye
Sunniyat Ka Chaman Leh Lahane Lage,
Nazdiyat Ka Kila Thar Tharane Lage
Maslak-e-aala Hazrat Ka Suniye Shamim,
Ek Purzor Nara Laga Dijiye
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यह नात-ए-पाक हुज़ूर ﷺ की बारगाह में हाज़िरी की तड़प, सहाबा और अहले-बैत की मोहब्बत, और मसलक-ए-आला हज़रत की पासदारी का बयान है, जिसमें शायर ने अपने दिल को इश्क़-ए-रसूल का मरकज़ बनाने की दुआ की है।
इस कलाम का मतलब है कि शायर की सबसे बड़ी आरज़ू हुज़ूर ﷺ का दीदार और मदीना शरीफ़ की ज़ियारत (दर्शन) करना है ताकि उसका सोया हुआ मुक़द्दर जाग जाए। साथ ही इसमें हज़रत इमाम हुसैन (ज़हरा के लाल) द्वारा हज़रत बिलाल से अपने नाना जान ﷺ के ज़माने की वही पुरानी अज़ान दोबारा सुनने की ख़्वाहिश का ज़िक्र है।
| शब्द (Word) | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| आरज़ू (Aarzoo) | इच्छा या तमन्ना (Wish) |
| मुक़द्दर (Muqaddar) | भाग्य या नसीब (Fate) |
| ख़ातमुल-मुरसलीन | आख़िरी नबी / रशूलों के सम्राट (हुज़ूर ﷺ) |
| सब्ज़ गुम्बद | मदीना शरीफ़ का हरा गुम्बद (Green Dome) |
| ज़हरा के लाल | सैयदा फ़ातिमा ज़हरा के बेटे (हज़रत इमाम हुसैन) |
| नज़दियत (Nazdiyat) | वैचारिक रूप से विरोधी एक फ़िरक़ा (विपक्ष) |
| पुरज़ोर (Purzor) | पूरी ताक़त से / बुलंद (Powerful) |
शायर 'शमीम' इस नात में अपने सीने को मदीना जैसी पाकीज़गी और इश्क़ से रोशन करने की दुआ करते हैं। वह बयां करते हैं कि सच्चा आशिक़-ए-रसूल वही है जो नबी की शान में गुस्ताख़ी करने वालों का डटकर विरोध करे; और सुन्नियत के चमन को हरा-भरा रखने के लिए मसलक-ए-आला हज़रत का पुरज़ोर नारा लगाए।
नात के मुताबिक ज़हरा के लाल (इमाम हुसैन) ने हज़रत बिलाल से किस चीज़ की फ़रमाइश की थी, और शायर शमीम ने किसका नारा लगाने को कहा है?