मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : चलो बरेली चल कर देखें जलवा आला हज़रत का
श्रेणी (कटेगरी) : कलाम के बोल (लीरिक्स) मनकबत के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : अख्तर परवाज़ हबीबी
नातख्वान/कलाकार: अख्तर परवाज़ हबीबी
जोड़ा गया : 09 Sep, 2025 08:27 AM IST
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चलो बरेली चल कर देखें जलवा आला हज़रत का,
जगमग जगमग चमक रहा है रोज़ा आला हज़रत का।
हमको ख़ुदा तक, तुमको ख़ुदा तक, सबको ख़ुदा तक,
पहुँचा देगी निस्बत आला हज़रत की,
चलता है बाज़ार-ए-नबी में सिक्का आला हज़रत का।
जगमग जगमग चमक रहा है रोज़ा आला हज़रत का।
मेरे नबी की गुस्ताख़ी से बाज़ तो आ जा ऐ नजदी,
वरना हाथ में है हमारे डंडा आला हज़रत का।
जगमग जगमग चमक रहा है रोज़ा आला हज़रत का।
चलो बरेली चल कर देखें जलवा आला हज़रत का,
जगमग जगमग चमक रहा है रोज़ा आला हज़रत का।
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यह मनक़बत इमाम अहमद रज़ा खान (आला हज़रत) की शान और उनकी धार्मिक सेवाओं के सम्मान में लिखी गई है। इसमें बरेली शरीफ स्थित उनके मज़ार की रौनक़ और उनके द्वारा सिखाए गए 'इश्क़-ए-रसूल' के मार्ग का वर्णन है।
कवि कहता है कि बरेली चलो और आला हज़रत की रूहानी चमक का नज़ारा करो, जिनका दरबार नूर से जगमगा रहा है। उनकी शिक्षाओं और उनसे जुड़ाव (निस्बत) का मार्ग सीधे ईश्वर तक ले जाता है, और नबी ﷺ की बारगाह में उनके इल्म और वफ़ादारी का बोलबाला है।
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| जलवा | भव्यता या रौनक़ |
| रोज़ा | मज़ार या समाधि |
| निस्बत | आध्यात्मिक जुड़ाव या संबंध |
| सिक्का चलना | प्रभाव या प्रभुत्व होना |
| बाज़ आना | रुक जाना या दूर रहना |
| गुस्ताख़ी | अपमान या बेअदबी |
इस मनक़बत का सार यह है कि आला हज़रत ने अपनी लेखनी और इल्म के माध्यम से लोगों को अल्लाह और उसके रसूल ﷺ से जोड़ा है। कवि विरोधियों को चेतावनी देता है कि नबी की शान में गुस्ताख़ी बर्दाश्त नहीं की जाएगी, क्योंकि आला हज़रत की दलीलें और उनका 'मसलक' सत्य की रक्षा के लिए एक मज़बूत ढाल (डंडा) की तरह है।
"चलता है बाज़ार-ए-नबी में सिक्का आला हज़रत का"—क्या यह पंक्ति आला हज़रत के इल्मी रुतबे को पूरी तरह स्पष्ट नहीं करती?