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दुआएं मआसूरा (नबी ﷺ से वर्णित प्रामाणिक दुआ)

(Al-Ma’thoorah Supplication (Authentic/Prophetic Transmitted Dua))


दुआएं मआसूरा (नबी ﷺ से वर्णित प्रामाणिक दुआ) हिन्दी में पढ़ें और याद करे आसान अर्थ के साथ।

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दुआएं मआसूरा (नबी ﷺ से वर्णित प्रामाणिक दुआ)

Updated :08 May, 2026 04:05 PM IST

श्रेणियाँ (कटेगरीस) : कुरान से दैनिक जीवन रमज़ान स्पेशल

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اَللّٰھُمَّ أِنِّیْ ظَلَمْتُ نَفْسِیْ ظُلْمًا کَثِیْرًا وَّلَا یَغْفِرُ الذُّنُوْبَ اِلَّا أَنْتَ فَاغْفِرْلِیْ مَغْفِرَةً مِّنْ عِنْدِكَ وَارْحَمْنِیْ أِنَّكَ أَنْتَ الْغَفُوْرُ الرَّحِیْمَ

दुआएं मआसूरा (नबी ﷺ से वर्णित प्रामाणिक दुआ)

दुआएं मआसूरा (नबी ﷺ से वर्णित प्रामाणिक दुआ)

अर्थ:

हे अल्लाह, मैंने अपने ऊपर बहुत ज़ुल्म किया है और तेरे सिवा कोई गुनाह माफ़ नहीं करता। तू मुझे माफ़ कर दे और मुझ पर रहम फरमा। निस्संदेह तू बहुत माफ़ करने वाला, बड़ा दयालु है।

अंग्रेजी में मतलब:

O Allah, I have greatly wronged myself, and no one forgives sins but you. So, grant me forgiveness and have mercy on me. Surely, You are Forgiving, Merciful.

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Dua Explanation, Quranic Reference & Summary

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व्याख्या (Explanation)

दुआ-ए-मासूरा वह दुआ है जो नमाज़ के आखिरी हिस्से में 'अत्तहियात' और 'दुरूद शरीफ' के बाद पढ़ी जाती है। यह दुआ एक बंदे की बेबसी और खुदा की बड़ाई का सबसे खूबसूरत इकरार है। इसमें "अपने आप पर ज़ुल्म" करने का मतलब यह है कि जब हम अल्लाह की नाफरमानी करते हैं, तो हम वास्तव में अपनी ही आत्मा का नुकसान करते हैं। यह दुआ हमें सिखाती है कि इंसान चाहे कितना ही इबादत गुज़ार क्यों न हो जाए, वह अंततः अल्लाह की माफी और रहम का मोहताज रहता है। यह हमें घमंड से बचाती है और दिल में यह यकीन पैदा करती है कि सिर्फ ईश्वर ही हमारे पापों को मिटा सकता है।


क्या कुरान या हदीस में इसका कोई संदर्भ है?

यह दुआ सहीह बुखारी (हदीस: 834) और सहीह मुस्लिम में मौजूद एक बहुत ही प्रामाणिक (Authentic) हदीस है। हज़रत अबु बक्र सिद्दीक (रज़ि.) ने अल्लाह के रसूल ﷺ से दरख्वास्त की थी कि "मुझे कोई ऐसी दुआ सिखाएं जो मैं अपनी नमाज़ में पढ़ूँ।" तब नबी करीम ﷺ ने उन्हें ये शब्द सिखाए थे। कुरान में भी हज़रत आदम (अ.) की दुआ में इसी तरह के शब्दों का उल्लेख है: "रब्बना ज़लमना अनफुसना..." (हे हमारे रब, हमने अपनी जानों पर ज़ुल्म किया), जो इस दुआ के भाव को और मज़बूत करता है।


सारांश (Summary)

दुआ-ए-मासूरा नमाज़ का वह कीमती हिस्सा है जो हमें अपनी गलतियों को मानकर खुदा के सामने झुकना सिखाता है। यह दुआ हमें याद दिलाती है कि माफ़ी माँगना कमज़ोरी नहीं, बल्कि अल्लाह की रहमत पाने का सबसे बड़ा ज़रिया है। इसके शब्द हमारे दिल को साफ़ करते हैं और नमाज़ को एक रूहानी पूर्णता प्रदान करते हैं। अंत में अल्लाह के 'गफ़ूर' और 'रहीम' होने का ज़िक्र हमें यह उम्मीद देता है कि सच्चे दिल की पुकार कभी खाली नहीं जाती।

क्या आपने कभी नमाज़ के आखिर में इस दुआ को पढ़ते वक़्त इसके गहरे मायनों पर गौर किया है?

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