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ज़रूरत की दुआ / हाजत की दुआ

(Prayer For A Need)


ज़रूरत की दुआ / हाजत की दुआ हिन्दी में पढ़ें और याद करे आसान अर्थ के साथ।

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ज़रूरत की दुआ / हाजत की दुआ

Updated :04 May, 2026 05:26 PM IST

श्रेणियाँ (कटेगरीस) : कुरान से दैनिक जीवन परिवार और घर

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لا إِلَهَ إلاَّ اللهُ الحَلِيمُ الكَرِيمُ، سُبْحَانَ اللهِ رَبِّ الْعَرْشِ العَظِيمِ ، الحَمْدُ لِلهِ رَبِّ العَالَمِيْنَ ، أَسْأَلُكَ مُوجِبَاتِ رَحْمَتِكَ ، وَعَزَائِمَ مَغْفِرَتِكَ ، وَالْغَنِيمَةَ مِنْ كُلِّ بِرّ،ٍ وَالسَّلامَةَ مِنْ كُلِّ إِثْمٍ ،لاَ تَدَعْ لِيْ ذَنْباً إِلاَّ غَفَرْتَهُ، وَلاَ هَمَّاً إِلاَّ فَرَّجْتَهُ، وَلاَ حَاجَةً هِيَ لَكَ رِضاً إِلاَّ قَضَيتَهَا يَا أَرْحَمَ الرَّاحِمِيْنَ

ज़रूरत की दुआ / हाजत की दुआ

ज़रूरत की दुआ / हाजत की दुआ

अर्थ:

अल्लाह के सिवा कोई इबादत के लायक नहीं, जो बहुत सहनशील और बड़ा करम करने वाला है। अल्लाह पाक है, जो अज़ीम अर्श का रब है। तमाम तारीफें अल्लाह के लिए हैं, जो सारे जहानों का रब है। मैं तुझसे उन चीज़ों का सवाल करता हूँ जो तेरी रहमत को लाती हैं और तेरी पूरी मग़फिरत का ज़रिया बनती हैं| हर नेक अमल का पूरा हिस्सा, और हर बुराई से हिफाज़त। मेरा कोई गुनाह न छोड़ मगर उसे माफ कर दे; कोई परेशानी न छोड़ मगर उसे दूर कर दे| और मेरी कोई ज़रूरत जो तुझे पसंद हो, उसे पूरी कर दे, ऐ सबसे ज़्यादा रहम करने वाले।

अंग्रेजी में मतलब:

There is no deity but Allah, the Most Forbearing, the Ever-Generous. Glory be unto Allah, Lord of the Great Throne. Praise be to Allah, Lord of all the worlds. I ask you for those things that bring about Your mercy and Your complete forgiveness; [for] a full portion of every righteous act, and safety from every vice. Do not leave any sin of mine except that You forgive it; any anxiety except that You relieve it; nor any need of mine that pleases You except that You fulfill it, O Most Merciful of those who show mercy.

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Dua Explanation, Quranic Reference & Summary

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व्याख्या (Explanation)

दुआ-ए-हाजत एक विशेष प्रार्थना है जो किसी भी जायज़ ज़रूरत, मुश्किल या दिली ख्वाहिश के वक्त अल्लाह से मदद माँगने के लिए पढ़ी जाती है। इसकी शुरुआत अल्लाह की बड़ाई और उसकी सिफ़ात (गुणों) जैसे 'हलीम' (सहनशील) और 'करीम' (उदार) के ज़िक्र से होती है। यह दुआ हमें सिखाती है कि अपनी माँग रखने से पहले अल्लाह की हम्द-ओ-सना (तारीफ़) करना सुन्नत है। इसमें न केवल दुनियावी ज़रूरतों को पूरा करने की गुज़ारिश है, बल्कि गुनाहों की माफ़ी और बुराइयों से बचने की तौफीक भी माँगी गई है। यह बंदे और रब के बीच एक गहरा आध्यात्मिक संबंध जोड़ती है।


क्या कुरान या हदीस में इसका कोई संदर्भ है?

यह दुआ मुख्य रूप से हदीस (Hadith) से प्रमाणित है। इसे तिर्मिज़ी (Sunan al-Tirmidhi) और इब्ने माजाह (Sunan Ibn Majah) जैसी प्रमुख हदीस की किताबों में बयान किया गया है। हज़रत अब्दुल्ला बिन अबी औफ़ा (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने फ़रमाया: "जिस किसी को अल्लाह से या किसी इंसान से कोई ज़रूरत हो, उसे चाहिए कि वह अच्छी तरह वुज़ू करे, दो रकात नमाज़ (सलात-अल-हाजत) पढ़े और फिर यह दुआ माँगे।"


सारांश (Summary)

(Hindi) दुआ-ए-हाजत अपनी मुश्किलों के हल के लिए अल्लाह की बारगाह में एक आज़िज़ी भरी अर्ज़ी है। इसमें अल्लाह की अज़मत का इक़रार करते हुए रहमत, मग़फ़िरत (क्षमा) और हर नेक काम में कामयाबी की दुआ की जाती है। यह हमें यकीन दिलाती है कि हर परेशानी को दूर करने वाला और हर ज़रूरत को पूरा करने वाला सिर्फ़ अल्लाह ही है।

क्या आपने कभी किसी विशेष उद्देश्य के लिए सलात-अल-हाजत पढ़ी है?

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