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अयादत करते वक्त की प्राथना (दुआ) (बीमार से मिलते वक्त की प्राथना)

(Dua When Visiting the Sick)


अयादत करते वक्त की प्राथना (दुआ) (बीमार से मिलते वक्त की प्राथना) हिन्दी में पढ़ें और याद करे आसान अर्थ के साथ।

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अयादत करते वक्त की प्राथना (दुआ) (बीमार से मिलते वक्त की प्राथना)

Updated :29 Apr, 2026 01:20 PM IST

श्रेणियाँ (कटेगरीस) : कुरान से दैनिक जीवन बीमारी और अस्पताल का दौरा (जाना)

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अयादत करते वक्त की प्राथना (दुआ) (बीमार से मिलते वक्त की प्राथना)

अयादत करते वक्त की प्राथना (दुआ) (बीमार से मिलते वक्त की प्राथना)

अर्थ:

कोई हर्ज की बात नहीं इंशाअल्लाह अज़वजल यह मरज़ गुनाहों से पाक करने वाला है।

अंग्रेजी में मतलब:

This is not a thing of harm In Sha Allah Azzawajal this illness purifies from sins.

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Dua Explanation, Quranic Reference & Summary

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व्याख्या (Explanation)

बीमार की अयादत (हाल-चाल पूछना) इस्लाम में बहुत बड़ा सवाब और सुन्नत का काम है। जब हम किसी बीमार से मिलने जाते हैं और यह दुआ पढ़ते हैं—"ला बा-असा तहूरुन इन शा अल्लाह"—तो यह मरीज़ के दिल को सुकून पहुँचाती है। यह उसे याद दिलाती है कि उसकी बीमारी कोई सज़ा नहीं, बल्कि अल्लाह की तरफ से उसके गुनाहों को मिटाने और उसे रूहानी तौर पर पाक करने का एक जरिया है। यह दुआ मरीज़ में हिम्मत पैदा करती है और उसे अल्लाह की रहमत पर भरोसा रखने का हौसला देती है।


क्या कुरान या हदीस में इसका कोई संदर्भ है?

यह दुआ सहीह बुखारी (हदीस संख्या 5656) में वर्णित है। हज़रत इब्न अब्बास (रज़ियल्लाहु अन्हु) से रिवायत है कि नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) जब किसी बीमार की अयादत के लिए जाते, तो यही दुआ फरमाते थे:

"ला बा-असा, तहूरुन इन शा अल्लाह।" (इसमें कोई हर्ज नहीं, इंशाअल्लाह यह बीमारी गुनाहों को पाक करने वाली है।)


सारांश (Summary)

बीमार की अयादत करना एक बहुत बड़ा सवाब का काम है जो आपसी मोहब्बत को बढ़ाता है। इस दुआ को पढ़कर हम मरीज़ को तसल्ली देते हैं कि उनकी तकलीफ उनके गुनाहों को धुलने का सबब बन रही है। यह दुआ मरीज़ की मायूसी को खत्म करती है और उन्हें अल्लाह की तरफ से दी गई आज़माइश में सब्र करने की हिम्मत देती है। अयादत के ज़रिए मरीज़ को यह अहसास होता है कि वह अकेला नहीं है और उसके ठीक होने की दुआ करने वाले साथ हैं।

क्या अयादत करते वक्त सिर्फ यही दुआ पढ़ना लाज़मी है, या हम मरीज़ से कोई और बात कर के भी उनका हौसला बढ़ा सकते हैं?

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