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रोज़ा इफ्तार करने की दुआ

(Dua for Iftar)


रोज़ा इफ्तार करने की दुआ हिन्दी में पढ़ें और याद करे आसान अर्थ के साथ।

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रोज़ा इफ्तार करने की दुआ

Updated :29 Apr, 2026 01:37 PM IST

श्रेणियाँ (कटेगरीस) : कुरान से दैनिक जीवन परिवार और घर खाने और पीने रमज़ान स्पेशल

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اَللّٰهُمَّ اِنِّی لَکَ صُمْتُ وَبِکَ اٰمَنْتُ وَعَلَيْکَ تَوَکَّلْتُ وَعَلٰی رِزْقِکَ اَفْطَرْتُ

रोज़ा इफ्तार करने की दुआ

रोज़ा इफ्तार करने की दुआ

अर्थ:

ऐ अल्लाह! मैं ने तेरी खातिर रोज़ा रखा और तेरे ऊपर ईमान लाया और तुझ पर भरोसा किया और तेरे रिज्क से उसे खोल रहा हूँ।

अंग्रेजी में मतलब:

O Allah! I fasted for you and I believe in you and I put my trust in You and I break my fast with your sustenance.

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Dua Explanation, Quranic Reference & Summary

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व्याख्या (Explanation)

रोज़ा इफ्तार करने की यह दुआ अल्लाह के प्रति कृतज्ञता (शुक्रगुज़ारी) का एक बहुत ही खूबसूरत माध्यम है। पूरे दिन भूखे और प्यासे रहकर, इफ्तार के वक्त जब हम यह दुआ पढ़ते हैं, तो हम यह स्वीकार करते हैं कि हमने यह इबादत सिर्फ और सिर्फ अल्लाह की रज़ा के लिए की है। यह दुआ हमारे ईमान को ताज़ा करती है और हमें याद दिलाती है कि हमारी हर खुशी और हमारा हर रिज़्क (भोजन) अल्लाह की ही अता की गई देन है। इफ्तार के वक्त इस दुआ का पढ़ना दिल को सुकून और रूहानी ताज़गी देता है।


क्या कुरान या हदीस में इसका कोई संदर्भ है?

यह दुआ कुरान की किसी आयत में तो नहीं है, लेकिन यह हदीस की किताबों में (जैसे सुनन अबू दाऊद) वर्णित है। हदीस के मुताबिक, नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) इफ्तार के समय इसी अर्थ वाली दुआओं का एहतमाम फरमाते थे। हालाँकि इफ्तार के समय के लिए अलग-अलग शब्द वाली दुआएं भी हदीसों में मिलती हैं, लेकिन यह दुआ अपनी सादगी और अर्थ की गहराई के कारण बहुत प्रसिद्ध है और सुन्नत के मुताबिक मानी जाती है।


सारांश (Summary)

इफ्तार के वक्त यह दुआ पढ़ना एक सुन्नत है जो हमें इबादत और शुकराने के एहसासात से भर देती है। यह दुआ रोज़ेदार को याद दिलाती है कि उसका पूरे दिन का उपवास केवल अल्लाह की रज़ा के लिए था। इसे पढ़कर हम अल्लाह के अता किए हुए रिज़्क से अपना रोज़ा खोलते हैं और अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं। यह अमल इफ्तार की महफिल को रूहानी सुकून और बरकत से भर देता है और हमें अल्लाह के प्रति कृतज्ञ बनाता है।

इफ्तार के वक्त यह दुआ पढ़ना क्यों ज़रूरी है, और अगर कोई दुआ पढ़ना भूल जाए तो क्या उसका रोज़ा नहीं होगा?

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