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उम्मत का गम है क्या कोई पूछे हुज़ूर से Lyrics In हिन्दी

(उम्मत का गम है क्या कोई पूछे हुज़ूर से, आँसू छलक छलक पड़े चषमाने नूर से)


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Shan E Nabi Team Desk
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टाइटल : उम्मत का गम है क्या कोई पूछे हुज़ूर से

श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)

जोड़ा गया : 04 Jul, 2022 07:15 AM IST

बार देखा गया : 3.6K

Time to read: 1 min read

बोल (लीरिक्स) की भाषा चुनें:

उम्मत का गम है क्या कोई पूछे हुज़ूर से (x2)
आँसू छलक छलक पड़े चसमाने नूर से
इफ्तार कर रहे है मदीने मे मुस्तफा (x2)
पानी से या नामक से या अजवा खुज़ूर से (x2)

आँसू छलक छलक पड़े चषमाने नूर से

जिबरील कह रहे है फरिश्तों की बज़्म मे (x2)
प्यार मेरा बेलाल है जन्नत की हूर से
जिबरील कह रहे है फरिश्तों की बज़्म मे (x2)
कितना हसीन बेलाल है जन्नत की हूर से
इस वास्ते ज़कात को लाज़िम किया गया (x2)
मुफलिश के घर मे रोशनी पहुचे जरूर से (x2)

आँसू छलक छलक पड़े चषमाने नूर से

दुश्मन भी चेहरा देखे तो वो भी यही कहे (x2)
अख्तर चमक रहा है अंधेरे मे नूर से

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Lyrics Explanation, Word Meanings & Summary

This summary is AI-generated • Reviewed for quality.

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यह अत्यंत भावुक और रूहानी नात शरीफ़ है, जिसमें अपनी उम्मत (अनुयायियों) के लिए पैगंबर मुहम्मद ﷺ की असीम व्याकुलता, हज़रत बिलाल (र.अ.) के आध्यात्मिक सौंदर्य, ज़कात के सामाजिक महत्व और महापुरुषों के नूरानी प्रभाव का सुंदर वर्णन है।

व्याख्या (Lyrics Explanation)

इन पंक्तियों का अर्थ है कि यदि कोई यह जानना चाहता है कि अपनी उम्मत का दर्द क्या होता है, तो वह हुज़ूर ﷺ से पूछे, जिनकी पवित्र नूरानी आँखों (चश्माने नूर) से सदैव अपनी उम्मत की चिंता और उनकी भलाई के लिए आँसू छलक पड़ते थे। वे मदीना शरीफ़ में पानी, नमक या अजवा खजूर जैसी साधारण चीज़ों से बेहद सादगी के साथ इफ़्तार करते हैं और निरंतर अपनी उम्मत के ग़म में डूबे रहते हैं।


शब्दों के अर्थ (Word Meanings)

शब्दअर्थ (Hindi)
चश्माने नूरनूरानी आँखें / दिव्य दृष्टि
बज़्मसभा / महफ़िल
अजवामदीना मुनव्वरा की एक विशेष और उत्तम खजूर
लाज़िमअनिवार्य / आवश्यक (फ़र्ज़) किया गया
मुफ़्लिसग़रीब / निर्धन या लाचार

सारांश (Summary)

कवि कहता है कि हुज़ूर ﷺ को अपनी उम्मत की इस क़दर फिक्र है कि उनकी आँखें हमेशा नम रहती हैं। कलाम में वर्णन है कि हज़रत जिबरील (अ.स.) फ़रिश्तों की सभा में हज़रत बिलाल (र.अ.) की सादगी और निष्ठा की प्रशंसा करते हुए उन्हें जन्नत की हूर से भी अधिक हसीन और प्रिय बताते हैं। इसके साथ ही, ज़कात व्यवस्था के पीछे का मूल उद्देश्य समझाया गया है कि इसके माध्यम से समाज के निर्धन लोगों के घरों तक भी ख़ुशी की रोशनी पहुँचे। अंत में कवि कहता है कि ईश्वर के प्रिय नबी के आशीर्वाद से अख्तर (ताजुश्शरिया) का मुखमंडल अंधकार में भी प्रकाश की तरह चमकता है।

नात के अनुसार, गरीबों और निर्धनों (मुफ़्लिस) के घर तक ख़ुशी की रोशनी पहुँचाने के लिए किस इस्लामी फ़र्ज़ को 'लाज़िम' (अनिवार्य) किया गया है?

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