मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : मुहम्मद पे सब कुछ लुटाने चले हैं हुसैन आज सर को कटाने चले हैं
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : शमीम रज़ा फ़ैज़ी
नातख्वान/कलाकार: शमीम रज़ा फ़ैज़ी
जोड़ा गया : 26 Sep, 2022 02:16 PM IST
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मुहम्मद पे सब कुछ लुटाने चले हैं
हुसैन आज सर को कटाने चले हैं
जो बचपन में नाना से वा’दा किया था
उसे करबला में निभाने चले हैं
मुहम्मद पे सब कुछ लुटाने चले हैं
हुसैन आज सर को कटाने चले हैं
मिलेगा न तारीख़ में ऐसा गाज़ी
लगा दे जो औलाद की जां की बाज़ी
दिखाए कोई उनके जैसा नमाज़ी
जो सजदे में गरदन कटाने चले हैं
मुहम्मद पे सब कुछ लुटाने चले हैं
हुसैन आज सर को कटाने चले हैं
बड़े नाज़ से जिन को पाला नबी ने
जिन्हें रखा पलकों पे मौला अली ने
जिन्हें फ़ातिमा बी ने झूला झुलाया
वो हीं तीर सीने पे खाने चले हैं
मुहम्मद पे सब कुछ लुटाने चले हैं
हुसैन आज सर को कटाने चले हैं
यही केह के अकबर की तलवार चमकी
इधर आ सितमगर, क्या देता है धमकी
जो अकबर निशानी है शाहे-उमम की
अली का वो तेवर दिखाने चले हैं
मुहम्मद पे सब कुछ लुटाने चले हैं
हुसैन आज सर को कटाने चले हैं
जो बचपन में नाना से वा’दा किया था
उसे करबला में निभाने चले हैं
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यह अत्यंत भावुक और ओजस्वी मन्क़बत हज़रत इमाम हुसैन (र.अ.) और उनके परिवार द्वारा कर्बला के मैदान में दी गई सर्वोच्च क़ुरबानी, उनके अद्वितीय सब्र और सत्य की रक्षा के अटूट संकल्प को समर्पित है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि इमाम हुसैन (र.अ.) अपने नाना, हज़रत मोहम्मद मुस्तफ़ा ﷺ के लाए हुए धर्म (इस्लाम) को बचाने के लिए अपना घर-बार और सब कुछ न्योछावर करने जा रहे हैं। उन्होंने बचपन में अपने नाना से सत्य की रक्षा का जो वचन दिया था, उसे पूरा करने के लिए वह कर्बला की तप्त भूमि पर नमाज़ के आख़िरी सजदे में अपनी पवित्र गर्दन कटाने को तैयार हैं।
| शब्द | अर्थ (Hindi) |
|---|---|
| तारीख़ | इतिहास / समय चक्र |
| गाज़ी | वह योद्धा जो धर्म और सत्य के युद्ध से जीवित लौटे |
| बाज़ी लगाना | दांव पर लगाना / प्राण अर्पित करना |
| सतमगर | अत्याचारी / ज़ालिम या शत्रु |
| शाहे-उमम | समस्त उम्मत (संसार) के बादशाह / हुज़ूर ﷺ |
| तेवर | शौर्य का अंदाज़ / वीर रूप |
कवि कहता है कि इतिहास में इमाम हुसैन (र.अ.) जैसा न तो कोई वीर योद्धा (गाज़ी) हुआ और न ही कोई ऐसा सच्चा नमाज़ी, जिसने ईश्वर की राह में अपनी संतान तक को कुर्बान कर दिया। जिन्हें पैगंबर ﷺ, हज़रत अली (र.अ.) और माता फ़ातिमा (र.अ.) ने अत्यंत लाड-प्यार से पाला था, आज वही दीन की रक्षा के लिए अपने सीने पर तीर खाने जा रहे हैं। इसी युद्ध में उनके युवा पुत्र हज़रत अली अकबर (र.अ.) भी अपने दादा हज़रत अली के समान वीरता और तेवर दिखाते हुए अत्याचारियों का डटकर सामना कर रहे हैं।
शायर के अनुसार, हज़रत इमाम हुसैन (र.अ.) ने बचपन में अपने नाना हुज़ूर ﷺ से जो वादा किया था, उसे उन्होंने कहाँ और किस तरह निभाया?