मेरे सरकार आए
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टाइटल : दिल से दीवाना हूँ दस्त-गीर का ग़ौस-उल-वरा, पीरान-ए-पीर का
श्रेणी (कटेगरी) : कव्वाली के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : विविध/अज्ञात
नातख्वान/कलाकार: विविध/अज्ञात
जोड़ा गया : 03 Nov, 2022 07:54 AM IST
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अपने करम से भर दिया कासा फ़क़ीर का
दुनिया में मुझ को दे दिया रुत्बा अमीर का
मैं क़ादरी हूँ, शुक्र है रब्ब-ए-क़दीर का
हाथों में मेरे हाथ है पीरान-ए-पीर का
मुश्किल पड़े तो याद करो दस्त-गीर को
बग़दाद वाले हज़रत-ए-पीरान-ए-पीर को
यही वो ग़ौस हैं मुर्दों को जिलाने वाले
इन्हें कहते हैं मुहम्मद के घराने वाले
दिल से दीवाना हूँ दस्त-गीर का
ग़ौस-उल-वरा, पीरान-ए-पीर का
ग़ौस-ए-आ'ज़म सब पीरों के पीर हैं
दुखियों के दाता हैं, दस्त-गीर हैं
मर्तबा बड़ा है बड़े पीर का
ग़ौस-उल-वरा, पीरान-ए-पीर का
दिल से दीवाना हूँ दस्त-गीर का
ग़ौस-उल-वरा, पीरान-ए-पीर का
एक दिन देखिए दरिया पे हुवा उन का गुज़र
ग़म की मारी हुई बुढ़िया पे पड़ी उन की नज़र
रोती बुढ़िया नज़र आई तो वहाँ ठहर गए
उन को जाना था कहाँ और कहाँ ठहर गए
पूछा बुढ़िया से, बता किस ने सताया है तुझे ?
दुख दिया, दर्द दिया, किस ने सताया है तुझे ?
बोली बुढ़िया कि समुंदर में बराती डूबे
जितने पानी में थे डूबे हुवे, साथी निकले
डूबी जो कश्ती थी वो निकाल दी
एक बुढ़िया की क़िस्मत सँवार दी
लिखा पूरा हो गया तक़दीर का
ग़ौस-उल-वरा, पीरान-ए-पीर का
डूबी जो कश्ती थी वो निकाल दी
आई मुश्किल, मीराँ ! तुम ने टाल दी
जल्वा रौशन है रौशन-ज़मीर का
ग़ौस-उल-वरा, पीरान-ए-पीर का
दिल से दीवाना हूँ दस्त-गीर का
ग़ौस-उल-वरा, पीरान-ए-पीर का
हसनी हैं, हुसैनी हैं, वो दस्त-गीर
पंज-तनी हैं मेरे पीरान-ए-पीर
मैं दीवाना हूँ उन की तस्वीर का
ग़ौस-उल-वरा, पीरान-ए-पीर का
दिल से दीवाना हूँ दस्त-गीर का
ग़ौस-उल-वरा, पीरान-ए-पीर का
इक नज़र, मीराँ मुहियुद्दीन ! कर
आप का दर छोड़ के जाएँ किधर
सदक़ा दे दो शब्बर-ओ-शब्बीर का
ग़ौस-उल-वरा, पीरान-ए-पीर का
दिल से दीवाना हूँ दस्त-गीर का
ग़ौस-उल-वरा, पीरान-ए-पीर का
शान उन की वलियों में है बे-नज़ीर
मैं भी हूँ, अयाज़ ! उसी दर का फ़क़ीर
दामन वो भर देंगे मुझ ग़रीब का
ग़ौस-उल-वरा, पीरान-ए-पीर का
सारे 'आलम में है रौशन उन का नाम
मैं भी हूँ, अयाज़ ! उसी दर का ग़ुलाम
मँगता हूँ मैं शह-ए-बे-नज़ीर का
ग़ौस-उल-वरा, पीरान-ए-पीर का
दिल से दीवाना हूँ दस्त-गीर का
ग़ौस-उल-वरा, पीरान-ए-पीर का
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यह हुज़ूर ग़ौस-ए-आज़म शेख अब्दुल क़ादिर जीलानी (र.अ.) की अज़मत, उनकी करामात और विलायत का सुंदर वर्णन है, जिसमें बताया गया है कि वह सभी वलियों के सरदार हैं और उनके दर पर आने वाले हर दुखी और फ़क़ीर की झोली भर जाती है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि ग़ौस-ए-आज़म (र.अ.) का मर्तबा वलियों में बे-नज़ीर है, जो अपनी एक नज़र-ए-करम से डूबती हुई कश्तियों को पार लगा देते हैं। कवि कहता है कि जो कोई भी सच्चे दिल से बग़दाद के पीर को अपनी मुश्किल में पुकारता है, हुज़ूर अल-मदद कहकर उसकी हर आफ़त को टाल देते हैं और फ़क़ीर को भी अमीरी का रुतबा बख़्श देते हैं।
| शब्द | अर्थ (Meaning) |
|---|---|
| कासा | भिक्षा का पात्र / फ़क़ीर का प्याला (Begging bowl) |
| दस्त-गीर | मदद करने वाला / हाथ थामने वाला (Helper) |
| ग़ौस-उल-वरा | सारी दुनिया की फ़रियाद सुनने वाले (Saviour of the world) |
| पीरान-ए-पीर | पीरों के पीर / सब वलियों के सरदार (Saint of saints) |
| शब्बर-ओ-शब्बीर | इमाम हसन और इमाम हुसैन (अ.स.) के पवित्र नाम |
| रौशन-ज़मीर | अंतर्यामी / आध्यात्मिक रूप से प्रबुद्ध (Spiritually enlightened) |
इस कलाम का मुख्य सार यह है कि ग़ौस पाक का ताल्लुक नबी के घराने (हसनी-हुसैनी और पंजतन) से है, इसलिए उनकी करामात बेमिसाल हैं। कवि उनकी उस मशहूर ऐतिहासिक घटना का ज़िक्र करता है जहाँ उन्होंने बारह साल से डूबी हुई बारातियों की कश्ती को एक बूढ़ी माँ की पुकार पर समंदर से सही-सलामत निकाल दिया था। उनके दर से कोई भी सवाली या कवि 'अयाज़' जैसा अदना ग़ुलाम कभी ख़ाली हाथ नहीं लौटता।
गीत के मुताबिक, गौस-ए-आज़म ने समंदर के किनारे रोने वाली बुढ़िया की क्या मदद की थी, और उनका ताल्लुक किसके घराने से बताया गया है?