मुस्तफ़ा का प्यारा है फ़ातिमा का शहज़ादा
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टाइटल : दिल में जमाले गुम्बद ए खजरा बसा के देख
श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)
लेखक/गीतकार : सज्जाद निज़ामी (मरहूम)
नातख्वान/कलाकार: सज्जाद निज़ामी (मरहूम)
जोड़ा गया : 24 Sep, 2022 02:54 PM IST
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दिल में जमाले गुम्बद ए खजरा बसा के देख,
उनकी बुलंदियों को भी नज़रे झुका के देख (x2)
सिदरा पे भी उजाले हैं गारे हीरा के देख,
पहुंचे कदम कहां से कहां मुस्तफा के देख (x2)
पड़ जाएगी कलेजे में ठण्डक अभी अभी,
इश्के नबी की आग तो दिल में लगा के देख (x2)
इश्क ऐ रसूल खुद उड़ा ले जाऐगा तुझे,
टूटे हुए ही बाज़ू जरा फडफडा के देख (x2)
पहचान जब ना सुन्नी वहाबी की हो तुझे,
अहमद रज़ा के नाम का नारा लगा के देख (x2)
आ जाएगा नज़र तुझे अल्लाह का जमाल,
चल नजदिया बरेली का सुरमा लगा के देख (x2)
किस्मत बदल ना जाये तो मैं जिम्मेदार हूं,
सरकार के गुलामों की शफ में तो आके देख (x2)
पहुंचे कदम कहां से कहां मुस्तफा के देख,
उनकी बुलंदियों को भी नज़रे झुका के देख
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यह कलाम हुज़ूर पाक ﷺ की महानता, ईश्वर के प्रति उनके प्रेम (इश्क़-ए-रसूल) की असीम शक्ति और आला हज़रत इमाम अहमद रज़ा ख़ान की दीक्षा (मसलक) की महत्ता को बेहद जोश और अक़ीदत के साथ बयां करता है।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि अपने हृदय में गुम्बद-ए-ख़ज़रा (हुज़ूर ﷺ के रौज़े) की सुंदर छवि बसा कर देखो, उनकी महानता का स्तर इतना ऊँचा है कि वहाँ आँखें झुका कर ही उनकी शान को समझा जा सकता है। कवि कहता है कि आसमानों की आख़िरी सीमा (सिदरा) पर भी गुफ़ा-ए-हिरा (गारे-हीरा) का ही नूर चमक रहा है, जो यह दिखाता है कि मुस्तफ़ा ﷺ के पावन कदम कहाँ से कहाँ पहुँच गए।
| शब्द | अर्थ (Hindi) |
|---|---|
| जमाल | सौंदर्य / अलौकिक सुंदरता |
| गुम्बद-ए-ख़ज़रा | हरा गुम्बद (मदीना शरीफ़ में हुज़ूर ﷺ का रौज़ा) |
| सिदरा | सिदरा-तुल-मुन्तहा (सातवें आसमान पर स्थित एक पवित्र बेरी का पेड़/सीमा) |
| गारे-हीरा | हीरा नाम की गुफ़ा (जहाँ हुज़ूर ﷺ पर पहली वह्य/प्रकाशना उतरी थी) |
| बाज़ू | पंख / पर |
| शफ़ (सफ़) | पंक्ति / कतार |
कवि का कहना है कि यदि दिल को वास्तविक सुकून और ठंडक चाहिए, तो उसमें पैगंबर ﷺ के प्रेम की अग्नि जलानी होगी; यह प्रेम इतना शक्तिशाली है कि टूटे पंखों वाले (कमज़ोर) इंसान को भी बुलंदियों तक उड़ा ले जाता है। सही आस्था की पहचान के लिए कवि आला हज़रत का नाम लेने और 'बरेली का सुरमा' (वहाँ की शिक्षाओं) को अपनाने की सलाह देता है। अंत में वह पूर्ण विश्वास के साथ दावा करता है कि जो भी सच्चे मन से हुज़ूर ﷺ के सेवकों की पंक्ति में शामिल हो जाता है, उसकी किस्मत का बदलना निश्चित है।
शायर के अनुसार, यदि अपनी क़िस्मत को बदलना है तो इंसान को कहाँ और किस की सफ़ (पंक्ति) में आकर खड़ा होना पड़ेगा?