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अलविदा तैबा को करता हूँ नाना Lyrics In हिन्दी

(अलविदा तैबा को करता हूँ नाना, करबल के मैदान में जाता हूँ नाना)


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टाइटल : अलविदा तैबा को करता हूँ नाना

श्रेणी (कटेगरी) : नात के बोल (लीरिक्स)

लेखक/गीतकार : नदीम रज़ा फ़ैज़ी

नातख्वान/कलाकार: नदीम रज़ा फ़ैज़ी

जोड़ा गया : 13 Oct, 2022 12:36 PM IST

बार देखा गया : 2.5K

Time to read: 2 min read

बोल (लीरिक्स) की भाषा चुनें:

अलविदा तैबा को करता हूँ नाना,
करबल के मैदान में जाता हूँ नाना,
बचपन का वादा निभाता हूँ नाना

दीने नबी की खातिर सर को हम कटाएंगे,
मजहब ऐ इस्लाम का परचम हर सु हम लहरायेंगे,
बांधे कफन सर पे जाता हूँ नाना,
बचपन का वादा निभाता हूँ नाना

सहमा सहमा चंद ओ सूरज आसमा भी लगता है,
मैदाने करबल में आकर मेरा अकबर कहता है,
सब कुछ तुम्ही पे लूटाता हूँ नाना,
बचपन का वादा निभाता हूँ नाना

आले नबी की क्या है शान हम बताएंगे,
नामे यज़िदियत इस दुनिया से मिटाएंगे,
लेईनों की हशती को हम तो मिटाएंगे,
बातिल के आगे हरगिज न सर को झुकाएंगे,
राहे खुद में सर कटाता हूँ नाना,
बचपन का वादा निभाता हूँ नाना

अलविदा तैबा को करता हूँ नाना,
करबल के मैदान में जाता हूँ नाना

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Lyrics Explanation, Word Meanings & Summary

This summary is AI-generated • Reviewed for quality.

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यह नवास-ए-रसूल, हज़रत इमाम हुसैन (र.अ.) द्वारा मदीना (तैबा) छोड़ते समय अपने नाना हज़रत मोहम्मद ﷺ से विदा लेने और कर्बला के मैदान में धर्म की रक्षा के लिए सर्वस्व न्योछावर करने के दृढ़ संकल्प का एक भावुक और प्रेरणादायक वर्णन है।

व्याख्या (Lyrics Explanation)

इन पंक्तियों का अर्थ है कि इमाम हुसैन (र.अ.) अपने नाना के धर्म (दीन-ए-इस्लाम) की रक्षा के लिए अपने सर पर कफ़न बाँधकर कर्बला के मैदान की ओर जा रहे हैं। वे सत्य की राह पर अडिग रहते हुए अधर्म के आगे झुकने के बजाय अपना सब कुछ कुर्बान करके बचपन में किए गए अपने वादे को पूरा कर रहे हैं।


शब्दों के अर्थ (Word Meanings)

शब्दअर्थ (Hindi)
तैबामदीना शरीफ़ का पवित्र नाम
हर सूहर तरफ / चारों ओर
परचमझंडा / ध्वज
आले नबीपैगंबर साहब का पवित्र परिवार (अहले-बैत)
यज़िदियतअत्याचार, अन्याय और क्रूरता का प्रतीक (यज़ीद की नीति)
लईनोंधिक्कार योग्य लोग / यज़ीदी सेना
बातिलअसत्य / झूठ / अधर्म
राहे खुदाईश्वर की राह में / अल्लाह के रास्ते पर

सारांश (Summary)

हज़रत इमाम हुसैन (र.अ.) और उनका परिवार (विशेषकर उनके पुत्र हज़रत अली अकबर) सत्य और न्याय के झंडे को बुलंद रखने के लिए कर्बला के मैदान में उतर चुके हैं। वे यज़ीद जैसे अत्याचारी और असत्य (बातिल) के शासक के सामने कभी भी सिर न झुकाने का संकल्प लेते हैं और खुदा की राह में शहीद होकर दुनिया से हमेशा के लिए अन्याय का नामोनिशान मिटा देते हैं।

शायर के अनुसार, हज़रत इमाम हुसैन (र.अ.) किसके आगे 'हरगिज़ सर न झुकाने' और किस निज़ाम (व्यवस्था) को दुनिया से मिटाने का ऐलान करते हैं?

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