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रोज़ा रखने की नियत (दुआ)

(Dua Of Sehri)


रोज़ा रखने की नियत (दुआ) हिन्दी में पढ़ें और याद करे आसान अर्थ के साथ।

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रोज़ा रखने की नियत (दुआ)

Updated :29 Apr, 2026 01:21 PM IST

श्रेणियाँ (कटेगरीस) : कुरान से दैनिक जीवन खाने और पीने रमज़ान स्पेशल

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रोज़ा रखने की नियत (दुआ)

रोज़ा रखने की नियत (दुआ)

अर्थ:

और मैंने माहे रमज़ान के कल के रोज़े की नियत की

अंग्रेजी में मतलब:

I Intend to keep the fast for month of Ramadan

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Dua Explanation, Quranic Reference & Summary

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व्याख्या (Explanation)

रोज़े की नीयत का अर्थ है अल्लाह की रज़ा के लिए रोज़ा रखने का दृढ़ संकल्प (इरादा) करना। यह आपके दिल का वो पुख्ता फैसला है जो आपको सामान्य दिनचर्या से हटाकर इबादत की ओर ले जाता है। हालांकि अरबी में नीयत के शब्दों को दोहराना एक पसंदीदा और सुन्नत तरीका है ताकि मन एकाग्र हो सके, लेकिन हकीकत में नीयत दिल का वो इरादा है जो सहरी खत्म होने से पहले आपके मन में होना चाहिए। यह इबादत की रूह है, क्योंकि बिना सच्ची नीयत के कोई भी अमल अल्लाह की बारगाह में कबूल नहीं होता।


क्या कुरान या हदीस में इसका कोई संदर्भ है?

कुरान में रोज़ा रखने का हुक्म तो दिया गया है (सूरह अल-बकरा: 183-185), लेकिन नीयत के शब्दों के लिए कोई विशिष्ट कुरानी आयत नहीं है। अलबत्ता, नीयत की अहमियत के बारे में पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) की मशहूर हदीस है: "अमल का दारोमदार नियतों पर है, और हर इंसान को वही मिलेगा जिसकी उसने नीयत की।" (सहीह बुखारी)। यह हदीस स्पष्ट करती है कि रोज़े की नीयत का मुख्य आधार आपके दिल का सच्चा संकल्प है।


सारांश (Summary)

(English) The Niyat is a vital spiritual commitment where you resolve in your heart to fast for the sake of Allah. Though verbalizing the intention is a helpful and common practice to gain focus, the core requirement is your sincere internal resolve. It transforms your daily life into an act of worship, provided it is done with complete sincerity before the dawn prayer begins.

(Hindi) रोज़े की नीयत असल में दिल का वो पुख्ता इरादा है जिससे आप अल्लाह की रज़ा के लिए कल का रोज़ा रखने का अहद करते हैं। हालांकि अरबी में नीयत के शब्द पढ़ना एक पसंदीदा तरीका है, लेकिन असल अहमियत दिल के इरादे को है। यह नीयत सहरी के वक़्त से पहले होनी चाहिए। जब आप इस नीयत के साथ रोज़ा रखते हैं, तो आपका पूरा दिन इबादत में गिना जाता है और अल्लाह इसे कुबूल फरमाता है।

क्या रोज़ा रखने के लिए नियत की दुआ ज़ुबान से पढ़ना ज़रूरी है?

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