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भोजन (खाने) के बाद की प्राथना (दुआ)

(Dua After Eating)


भोजन (खाने) के बाद की प्राथना (दुआ) हिन्दी में पढ़ें और याद करे आसान अर्थ के साथ।

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भोजन (खाने) के बाद की प्राथना (दुआ)

Updated :29 Apr, 2026 03:42 PM IST

श्रेणियाँ (कटेगरीस) : खाने और पीने

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الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي أَطْعَمَنَا وَسَقَانَا وَجَعَلَنَا مِنَ الْمُسْلِمِينَ

भोजन (खाने) के बाद की प्राथना (दुआ)

भोजन (खाने) के बाद की प्राथना (दुआ)

अर्थ:

अल्लाह का शुक्र है जिसने हमें खिलाया पिलाया और मुसलमानों मे से बनाया

अंग्रेजी में मतलब:

Thanks to Allah Azzawajal who fed us and made us among Muslims

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Dua Explanation, Quranic Reference & Summary

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व्याख्या (Explanation)

खाना खाने के बाद की यह दुआ अल्लाह के प्रति शुक्रगुज़ारी का एक अत्यंत सुंदर माध्यम है। इस दुआ में हम न केवल भोजन और पानी (शारीरिक पोषण) के लिए अल्लाह का आभार व्यक्त करते हैं, बल्कि इस्लाम (ईमान) जैसी सबसे बड़ी आध्यात्मिक नेमत के लिए भी उनका शुक्रिया अदा करते हैं। यह दुआ हमें यह याद दिलाती है कि हमारा रिज़्क और हमारा ईमान दोनों ही अल्लाह की विशेष कृपा हैं। इसे पढ़कर हम अपनी रोज़मर्रा की ज़रूरत को एक 'इबादत' (पूजा) में बदल देते हैं, जिससे दिल में संतोष और कृतज्ञता का भाव पैदा होता है और हम अल्लाह की दी हुई नेमतों की कद्र करना सीखते हैं।


क्या कुरान या हदीस में इसका कोई संदर्भ है?

यह दुआ सुन्नत-ए-रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) से पूरी तरह साबित है।

  • हदीस का संदर्भ: यह विशिष्ट दुआ सुनन अबू दाऊद (3850) और जामे तिरमीज़ी (3457) में मिलती है। नबी-ए-करीम (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने सिखाया है कि जो भी खाना खाए और फिर यह कहे: "अलहमदुलिल्लाहिल्लज़ी अतअमना व सक़ाना व ज-अलना मुस्लिमीन" (तारीफ़ अल्लाह के लिए है जिसने हमें खिलाया, पिलाया और मुसलमानों में से बनाया), वह अपने रिज़्क के स्रोत को याद रखता है।
  • कुरान का संदर्भ: यद्यपि यह दुआ हदीस से है, लेकिन इसका मुख्य भाव 'शुक्र' (कृतज्ञता) है। कुरान पाक में सूरह इब्राहिम (14:7) में अल्लाह फरमाता है:

    "यदि तुम शुक्र (आभार) करोगे, तो मैं तुम्हें और अधिक दूँगा..." खाना खाने के बाद यह दुआ पढ़ना कुरान के इसी आदेश का पालन करना है।


सारांश (Summary)

भोजन के बाद यह दुआ पढ़ना अल्लाह की नेमतों का शुक्रिया अदा करने का सबसे आसान और प्रभावशाली तरीका है। यह हमें याद दिलाता है कि हमारा खान-पान और हमारा ईमान दोनों ही अल्लाह की कृपा का परिणाम हैं। इसे अपनी दैनिक आदत बनाकर हम अपने साधारण कार्यों को इबादत में बदल सकते हैं। यह दुआ न केवल शारीरिक पोषण के लिए धन्यवाद है, बल्कि हमारे दिल को अल्लाह के और करीब ले आती है और अहंकार को दूर करती है।

खाना खाने के बाद सिर्फ "अलहमदुलिल्लाह" कहना काफी है या पूरी दुआ पढ़ना बेहतर है?

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